पॉच हजार वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को योगा-
भ्यास करने की अभिशंसा की थी | किन्तु अर्जुन
जैसे पराक्रमी ने योगपद्धति के कठोर विधि _
विधान का अनुसरण करने में स्पष्ट रूप सेअपनी
अयोग्यता प्रकट की थी | वास्तविक योगाभ्यास
इंद्रियो पर नियंत्रण है | और जब यह नियंत्रण
स्थाई हो जाय़ तो ईश्वर में मन को केन्द्रित करना
है | मन की एकाग्रता का अभ्यास करने हेतु
एकान्तवास लेना पड़ता है |
अत्यंत दुखद है कि अनेकानेक स्वयं घोषित
योगी „योगाभ्यास के प्रति लोगों के प्रवृति का
शोषण करते हुए अपना व्यापार चलाते हैं |
मनुष्य को कार्य व्यापार के क्षेत्र मे व्यावहारिक
होना चाहिए लेकिन योग के नाम पर व्यायाम
कलाओं के अभ्यास में लोगों का मूल्यवान समय
नष्ट नही करना चाहिए |
इस युग मे लोग सामान्यत: अल्पायु तथा आध्या-
त्मिक जीवन को समझने में अत्यंत मन्द होते हैं
यदि किसी की रूचि होती भी है तो वे तथाकथित
योगियों द्वारा अनेक प्रकार के छलप्रपंचों से पथ
भ्रष्ट कर दिये जाते हैं |
योग के पूर्ण अवस्था के ज्ञान का एकमात्र
उपाय भगवद्गीता के सिद्थान्तों का अनुकरण है|
पूर्ण योग के लिए आठ प्रकार की सिद्धियॉ हैं |
जनार्दन त्रिपाठी 9005030949
सोमवार, मार्च 02, 2015
योग
सुख-दुख
किसी वस्तु में सुख या दुख नहीं है .दिमाग जिस
वस्तु से जितना सुख-दुख ग्रहण करने में रुचि
लेता है उतना अनुभव करता है |
सोमवार, फ़रवरी 23, 2015
आध्यात्म
रविवार, जनवरी 25, 2015
अनावश्क खर्च बढाकर परेशान न हों यहॉ से जाना भी है भाई
वस्तुओं को खाएं | कोल्ड ड्रिक एवं चाय की
जगह पानी पिएं पानी का बोतल साथ रखें |
फोन पर अनावश्क समय इधर उधर की बातों
में बिताने पर समय व पैसे की वर्वादी होती है |
सामान की उपयोगिता हो तभी खरीदें | आय
प्रतिदिन हो ऐसी व्यवस्था वनायें | आय का
दस प्रतिशत भाग बचाकर लोककल्याण में
खर्च करें | खाना पकाने में प्रेशर कूकर एवम्
सस्ते व आसानी से उपलब्ध ईंधन का प्रयोग
करें | बजट के अनुसार प्लानिंग करें | सीजनल
सब्जियॉ पोषक एवं सस्ती होती हैं |
मित्र समझें | अच्छे लगने वाले शब्दों का प्रयोग
करें | चापलूसी करने से अच्छा चुप रहना है |
अपने सुख दुख का बयान न करें | लड़ाई से
बचें | किसी भी तरह के दिखावे से वचें | मेजबान
की कोई कमी न निकालें | मेजबान की मदद
करें | किसी की बात गम्भीरता से सुनें | वड़े व
धार्मिक लोगों का आदर करें |छोटों को स्नेह दें
और उन्हें घ्यान से सुनें | अपनी बात सलाह के
रूप में रखें |
अर्चन. वन्दन. दास्य. सख्य.और आत्मनिवेदन|
भक्त- आर्त .
स्लाम- समर्पण.
बौध- सत्य* अहिंसा.
मित्रता* क्षमा* परोपकार* उदारता* कृतज्ञता
सत्य* अहिंसा* प्यार* सद्भावना* समर्पण |
कान-शब्द.
नाक-गन्ध.|
पैर-गमन.
वआनंन्दन |
देती है |
है कोई भी इसकी यथार्थ गणना नहीं कर सकता
के लिए सबसे अधिक तथा ४५०० सेनीचे और
६५०० से ऊपर वहुत कम सुग्राही है |
की हर समस्या हल हो सकती है |
में अवतार से तथा कलयुग मे मनुष्य पृथ्वी
को चलाते हैं | सतयुग में मनुष्य की आयु
१००००० वर्ष. द्वापर में १०००० वर्ष. त्रेता
में १००० वर्ष एवम कलयुग में १०० वर्ष
अधिकतम होती है |
सुबह. शाम. दिन.रात.
जाड़ा.गर्मी.वरसात
कलयुग.सतयुग.द्वापर. त्रेता
हाथ झारी के जैसेचलोगे मदारी |
भाई वन्धू कुटुम्ब कबीला सब मतलब के यार|
११-जैसे प्राणी के साथ रहेंगे वैसा ही वनेंगे |
आसक्ति क्षणभंगुर एवं विरक्ति स्वाभाविक है |
होती है जो पतन का कारण है |
१३- विराट परमात्मा को जानकर ही मनुष्य इस
संसार में कार्यकुशलऔर संसार से मुक्त होता
हैं |
यज्ञकर्ममंत्रों. सामवेद में १८७३ गेयमंत्रों. और
अथर्ववेद में ५९७७ जादूटोने मारणमोहन विविध
मंत्रों का संग्रह है |
करना है |
आध्यात्मिक अनुभूति से ब्यक्ति के अंदर
बदलाव आता है |
विष्णुपुराण२३०००
पुराण१८०००.
पुराण९०००.
१४५००.
११०००.
८११००
१७०००
१९०००
४लाख श्लोकों का संग्रह हैं |
किशोरावस्था.जवानी.अधेड़वस्था.बुढ़ापा एवं
मृत्यु शरीर की ये ९ अवस्थायें हैं |
बुधवार, जनवरी 07, 2015
मृत्यु
यदि हम रोज जिन्दगी को अपने आखिरी
दिन की तरह जिएं तो हम खुद को सावित
कर दिखा सकते हैं | मृत्यु को याद रखना
मुझे अपनी जिन्दगी के अहम फैसले लेने
में मददगार होता है | क्योकि तब सारी
अपेक्षाएं. सारा घमंड. असफलता का डर
सब कुछ गायब हो जाता है | बचता वही है
जो वाकई जरूरी है | जिन्दगी का समय
कम होता जा रहा है .इसलिए इसे ब्यर्थ
न कीजिए |अपने अन्दर की आवाज कहीं
डूव न जाय.आप सच में क्या बनना चाहते
हैं यह महत्वपूर्ण है. बाकी सब वेकार |
सफलता हेतु
स्वयं पर विश्वास करें | शरीर को स्वस्थ वनावें
हीनता बोध न करें | संयमी एवं अनुसासित रहें
अपना कार्य ईश्वर का आदेश समझ कर करें
भय को दूर करें | सारी शक्ति अपने अन्दर मह
सूस करें | आत्मशक्ति जगायें |
मंगलवार, अक्टूबर 14, 2014
ब्रह्म-जीव-माया
ब्रह्म जीव एवं माया तीन तत्वों
से पृथ्वी चलती है | जीव एवं
माया (परा एवं अपरा शक्ति)
ब्रह्म की शक्ति हैं | हर जीव
का शरीर उसका साधन है |
पृथ्वी पर ८४ लाख जीव हैं |
मनुष्य रूपी जीव का साधन
ही ऐसा है कि इसके सहारे
ब्रह्म को जाना एवं उसके पास
जाया जा सकता है |
सोमवार, अक्टूबर 06, 2014
क्या आपने अपना चेहरा देखा है?
आप अपनी आंखों से स्वयं को नहीं
देख पाते और ईश्वर को इन्हीं आंखों
से देखने का प्रयास करते हैं | दर्पण
की सहायता से हम अपना उल्टा
प्रतिविम्ब देखते हैं|
प्रभु का सीधा प्रतिविम्ब
इक्सपर्ट की सहायता से देखा जा
सकता है |
जनार्दन त्रिपाठी
मो़ नं़ 9005030949
मंगलवार, सितंबर 30, 2014
माया-जीव
जैसे स्वप्न मे देखे जाने वाले पदार्थों
से उसे देखने वाले का कोई सम्वंध
नही होता वैसे शरीर से अतीत अनु
भव माया द्वारा नष्ट हो जाते हैं | जिस
समय समस्त इंद्रिया विषयों से हट
कर ईश्वर में स्थित हो जाती हैं उस
समय मनुष्य के रागद्वेषादि सारे
क्लेश नष्ट हो जाते हैं |
Life cycle
Life cycle involves
Birth. Growth. Re-
Production and
Death .
and seeks answer to
what is the purpose
of of life ,we shall not
answering.
we observe patients
lying in coma in hospitals
virtually supported by
machines which replace
heart and lungs. the patient
otherwise brain dead . Are
such patients who never
come back to normallife living or
non-living ? Janardan Tripathi.
ईश्वर को
दर्शन .धार्मिक ग्रन्थ .धर्मस्थल ईत्यादि
ईश्वरीय सत्ता को बताने का प्रयास है |
तिव्रसाधना और लगन से मूर्ति में चैतन्य
सत्ता का अनुभव किया जा सकता है |
ईश्वर को देखा जा सकता है.उनसे बातें
किया जा सकता है | परन्तु कौन इसकी
परवाह करता है |
अपनेआप को किसी उच्चतर की सेवा
में लगायें. और जब थोड़ा अवकाश मिले
तो लोगों को इकट्ठाकर अध्ययन
संगीत. वार्तालाप और अवतारों के चरित्र
की दैवी विशेषताओं पर विचार विमर्श
करें |
हम चाहे जिस कर्म में लगे हों यह समझें
कि ईश्वर ने ही अपनेआप को विभिन्न
जीवो के रूप में अभिव्यक्त किया है |
जीव-सेवा . ईश्वर-सेवा है | सबमें देवत्व
की अनुभूति अहंकार को ठहरने नही
देती | इसका अनुभव कर लेने पर हम
किसी से न तो ईर्ष्या करते है और न
ही हमारे अन्दर किसी पर दया करने
की जरूरत पड़ती | जीव को शिव का
रूप जानकर उसकी सेवा करने से चित्त
शुद्ध होता है | और अविलम्व ऐसा
साधक यह अनुभव करता है कि वह
भी ईश्वर का अविभक्त अंश है |
गुरुवार, सितंबर 04, 2014
वैराग्य
जाना वैराग्य नहीं है | घर छोड़ना
कोई बड़ी बात नहीं है | जिसके
मन में आसक्ति है „ वह कही चला
जाय वहा किसी न किसी चीज
से राग बना ही लेगा | जिसदिन
यह बात समझ में आ गई कि यह
शरीर मिट्टी है ; जिस संसार को
हम देख रहे हैं यह सदा नही रहेगा
और मृत्यु -सत्य एवं अवश्यम्भावी
है संसार किसी की भी जागीर
नही है| तो समझें वैराग्य हो गया |
शुक्रवार, अगस्त 22, 2014
भक्ति
हम सभी अपने अपनेभाई वहन
माता पिता पुत्र पत्नी इत्यादि तथा
समाज एवं संसार से सुख चाहते
है| और सुख प्राप्ति के विभिन्न
प्रयत्न करते है | ईश्वर की भक्ति
भी सुख प्राप्ति हेतु ही करते है|
किसी से कुछ प्राप्त करने के
तीन उपाय हैं एक जोरजबरदस्ती
से दूसरा चोरीकर तीसरा मॉगकर|
सांसारिक लोग सुख हेतुकिसी
न किसी से मॉगते है चोरी करते
हैं या जबरदस्ती पाने का प्रयास
करते हैं |
संसार में सुख नहीं है यहां कोई
सुखी नही है सब एक दूसरे से
मॉगते चोरी करते या जबरदस्ती
करते हैं |परन्तु जो रहेगा वही न
पायेंगे सो दुख व पदार्थ जो संसार
में है वह पाते हैं |
ईश्वर में सुख है | लेकिन वहा न
चोरी किया जा सकता न
जबरदस्ती मॉगने पर केवल इंद्रिय
सुख ही मिलेगा |
सब संसार ईश्वर का है सब जीव
जन्तु पेड़पौधे ईश्वर के हैं शरीर
ईश्वर के पंचभूतों का है अत: छोटे
से भूखण्ड पर कब्जा कर तेरा
तुझको अर्पण कहना मूर्खता है |
ईश्वर को कुछ देकर पाने की
इच्छा धुर्तता है | मंदिर में ही ताले
में बंद कर दिये है सोचना मक्कारी
है |
सुख केवल निश्छल हृदय व पवित्र
मन से ईश्वर भक्ति में भक्त को है |
ईश्वर भक्ति दवा है और समस्त दुख
क्लेश रोग है दवा का सेवन किये
बिना रोग से मुक्ति असम्भव है |
जनार्दन त्रिपाठी
गुरुवार, अगस्त 21, 2014
सूक्ष्म
श्रृष्टि संचालन प्रक्रिया पर ध्यान दें
तो प्रतीत होगा कि सुक्ष्म श क्तियों
के सहारे ही पृथ्वी सूर्य का चक्कर
लगाती है | तात्पर्य है कि सूक्ष्मशक्ति
स्थूल से ताकतवर होती है |
जल स्थूल है लेकिन सूक्ष्म वाष्प
मे परिवर्तित होने पर उसकी ताकत
बढ़ जाती है | इसीप्रकार हर स्थूल
वस्तु सूक्ष्म मे परिवर्तित होने पर
ताकतवर हो जायेगी |
गुरुवार, मई 29, 2014
रविवार, मई 04, 2014
शरीर/humen body/
शरीर का तभी तक महत्व है जब तक उसमे
जीव वसता हो | शरीर में बैठे जीव के दर्शन
के आकांक्षी को ;शरीर को मंदिर की तरह
पवित्र रखने का अभ्यास करना चाहिये|
जिसकी आंखें शरीर में रहते हुवे जीव को
देख सकती है' वही देव को देख सकता है
वही परोपकार कर सकता है तथा दूसरों को
सुख सन्तोष देते हुवे स्वयं सुख की अनुभूति
कर सकता है|
जनार्दन त्रिपाठी मो 9005030949
बुधवार, मार्च 12, 2014
ईश्वर का निराकार रूप
यह हमारे अंतःकरण में दिब्य भावनाओं एवं
मस्तिष्क में दिब्य विचार के रूप में रहती है |
मनुष्य में ईश्वरीय सत्ता -भावना . ज्ञान सत्ता
एवं हलचल के रूप मे दृष्टिगोचर होती है |
बुधवार, जनवरी 01, 2014
आध्यात्म
पृथ्वी पर कुछ भी स्थाई नही है | यह जड़ चेतन
संसार एक दूसरे के सहयोग से संचालित है|
सेवा भाव से जो ब्यक्ति मानवता के विकास हेतु
काम करता है ,वह अपने नाम ,रूप एव कीर्ति
को पृथ्वी पर अमर कर देता है| ं
यह शरीर हड्डी मांस व रूधिर का पिण्ड है| इसमे
5 ग्यानिेन्द्र्यां एवं 5 कर्मेन्द्रियां हैं | भोग इन्द्रियों
के विषय हैं , भोगों में प्रवृति क्रृत्रिम व निवृति
स्वाभाविक होती है| (कामना तो कृत्रिम रूप से
होती है परन्तु कामना से निवृति स्वाभाविक हो
जाती है ) |
अहंकारी,मिथ्याचारी,ईर्षालु,रिश्वतखोर,तथा दहेज
लोभी एवं अकूत धन संगरह करने वाला मृत्योप
रांत अपने सूछ्म शरीर से स्वप्न देखते हुए मनुष्य
के समान हजारों वर्ष तक यातनाएं झेलता है|
जनार्दन त्रिपाठी
मो़ न. 9005030949
मंगलवार, नवंबर 20, 2012
धर्म का सही अर्थ है विनम्र व्यवहार
धर्म का सही अर्थ है विनम्र व्यवहार :- परमात्मा जिस पर प्रशन्न होता है उसे विनम्र और जिसपर नाराज होता है उसे क्रोधी बनाता है। यदि आपको लगता है कि आपका स्वभाव क्रोधी है।तो आप प्रभु से अपने लिए केवल विनम्रता ही मागिये।व्यक्तित्व के गुण जैसे :-पहनावा ,रहन -सहन ,वार्तालाप का तरीका और विनम्रता इत्यादि मनुष्य की सफलता पर बहुत अधिक प्रभाव डालते है। क्या नाम जपने ,तीर्थ -स्नान करने ,मन्दिर, मस्जिद,गिरिजाघर या गुरुद्वारा जाने ,दान देने ,कर्मकांड का टंट -घंट करने और अनाचार से रहते हुए प्रतिदिन पूजापाठ करने से धर्मोद्देश्य की पूर्ति हो जाएगी? धर्म का सही अर्थ है विनम्र व्यवहार। और भूखे पेट के लिए उसका सारा धर्म है भोजन जुटाना। जनार्दन त्रिपाठी मोन 9005030949.
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