शुक्रवार, जुलाई 18, 2025

अपराध बोध

मनुष्य  भौतिकता के वशीभूत होकर स्वार्थवश अनैतिक कार्य करता है । हिंसा के दो प्रकार हैं ।शारीरिक एवं भावनात्मक । भावनात्मक हिंसा में मनुष्य दूसरों को धोखा देता है एवं उनके साथ अवांछित आचरण करता है ।चूंकि उसको यह मालूम रहता है कि यह गलत है अतः इससे होने वाले अपराध बोध के कारण वह मानसिक बिमारियों की चपेट में आ जाता है ।भावनात्मक हिंसा करने वाला आरंभ में इस अपराध बोध को स्वीकार नहीं करता ।परंतु धीरे धीरे उसकी अंतरआत्मा उसे यह  स्वीकार करने पर मजबूर कर देती है । कुछ  अच्छे संस्कार के लोग अपने कृत्य के पश्चाताप के रूप में पीड़ित से या तो क्षमा याचना कर लेते हैं या उनके नुकसान की भरपाई करके मुक्ति पा लेते हैं । अतः  इससे  सावधान रहना चाहिए. Janardan Tripathi. 

शनिवार, सितंबर 28, 2024

मन

मन अगर शरीर के साथ हो जाय तो मनुष्य सांसारिक और आत्मा के साथ हो जाय तो मनुष्य सन्यासी हो जाता है।

अमीर

जिसके पास कुछ भी नही है और दिल खोलकर हंस रहे हों वैसा अमीर कहां मिलेगा। और जिसके पास सब कुछ हो और हॅस भी न पा रहा हो वैसा भिखमंगा कहाॅ होगा। जनार्दन।

बुद्धिमान

बुद्धिमान मनुष्य को भविष्य की चिंता और भूतकाल की स्मृति मे नही उलझना चाहिए। वर्तमान को अच्छे ढंग से जीना चाहिए। क्योंकि वर्तमान निरंतर साथ रहेगा। भूतकाल स्मरण मे और भविष्यकाल कल्पनाशील होता है। जनार्दन।

शुक्रवार, अगस्त 23, 2024

लौकिक जीवन

लोकोत्तर विषयों की चिन्ता के लिए मनुष्य के पास न समय है न शक्ति। हम जिस जीवन को जी रहे हैं उसे नही समझ पाते तो मृत्यु को क्या समझेंगे? समाज की ईकाई परिवार है और परिवार की ईकाई मनुष्य। अधिकांश सामाजिक दोषों का मूल कारण स्वार्थपरता है। अपनी उन्नति के साथ समाज की उन्नति की आकांक्षा करनी चाहिए। साहस और परोपकार की भावना - दया, करूणा, सच्चाई विवेकशीलता,नम्रता और आत्मसम्मान को कभी नही छोड़ना चाहिए। जब किसी परिवार का स्वामी दुराचारी होता है तो वह सासन करने की दैवी अनुमति खो देता है। जिससे बड़ी तीव्रता से उसका ह्रास होता है।अगर सदाचारी है तो उन्नति करता है। दुनिया में क्षमा, प्रेम,धैर्य और शान्ति से बड़ा कोई शस्त्र नही है। हम अगर बुद्धि के जाल को काट दें और सरल प्राकृतिक जीवन अपना लें तो फिर सुखी हो जायेगे।हम इतिहास के जिन महापुरुषों को आदर्श मानते हैं उन्होंने कभी आक्रमणात्मक युद्ध नही किया - रक्षात्मक युद्ध किया।

गुरुवार, अगस्त 22, 2024

इच्छाओं में छिपा है दुःखों का कारण

हर समय एक इच्छा से दूसरी इच्छा की ओर भागने की बजाय,इच्छाओं के आंतरिक कारण जानने का प्रयास करना चाहिए। इच्छा, आसक्ति और आसक्ति दुख का कारण है। इच्छा की सम्मोहन शक्ति से मुक्त होकर दुखो से मुक्त हुआ जा सकता है।

मंगलवार, नवंबर 01, 2022

संसार

यह संसार एक मृत्युमय पथ है।हमलोग मन, शरीर,और बुद्धि से होने वाली सृष्टि के द्वारा बने हुए अज्ञानी जीव हैं। हम जाग्रत और स्वप्न अवस्थाओं में केवल गुणमय पदार्थोऔर विषयोंको एवं सुषुप्त अवस्था में केवल अज्ञान ही अज्ञान देखते हैं। हम वहिर्मुख होने के कारण बाहर की वस्तु तो देखते हैं, पर अन्दर अपने-आपको नहीं देख पाते।

शनिवार, अक्टूबर 29, 2022

सम्पत्ति

सम्पत्ति और ऐश्वर्य स्वप्न तुल्य हैं। सबसे प्रेमभाव वाली सम्पत्ति के प्राप्त हो जाने पर यह सारा विश्व और इसकी समस्त सम्पत्तियां मिट्टी के ढेर समान जान पड़ती है। मन को प्रेम भाव में, हाथ-पैर को अच्छा करने में, कानों को अच्छा सुनने मे,नेत्रों को अच्छा देखने में,मुख को अच्छा बोलने और नासिका को अच्छा गन्ध ग्रहण करने में लगाना चाहिए।इस प्रकार आत्मानंद मे रहने वाले के सामने सब तुच्छ है। घर, स्त्री, भाई-वन्धु, पुत्र,रत्न,आयुध इत्यादि वस्तु सब के सब असत्य हैं।  ऐसे पुरुष की रक्षा लिए परमात्मा का  सुदर्शन चक्र तैयार रहता है।जनार्दन त्रिपाठी मो•नं• 9005030949।

शुक्रवार, जुलाई 30, 2021

सभ्यता

पहले वह व्यक्ति सभ्य कहा जाता था, जिसका व्यवहार पवित्र, और जो धैर्यवान , गंभीर, हसमुख और विनयशील होता था। गरीबी और अमीरी के बीच उस समय कोई दीवार नहीं थी। ज्ञान का सम्मान उस समय राजा भी करता था और किसान भी करता था। दार्शनिक विचार अलग अलग होते हुए भी सभ्यता की कसौटी एक थी ।
इस समय, आधुनिक सभ्यता ने धनवान एवं निर्धन की दीवार खड़ी की है, भौतिकता एवं स्वार्थपरता उसकी आत्मा है।आधुनिकता से वंचित भाई जब आपको ठाट से देखता है, तो यह समझता है कि यह हमारा नहीं है। फिर आप कितनी ही बुलंद आवाज में परिवारवाद की हांक लगाएं वह आपकी ओर ध्यान नहीं देता। वह आपको पराया समझ लेता है। 
                     जनार्दन त्रिपाठी देवरिया उत्तर प्रदेश। 

शुक्रवार, अप्रैल 02, 2021

भगवत कृपा

व्यक्ति का प्रभाव, पर्वत, वृक्ष इत्यादि जो भी स्थिर है, इन सब का वजूद तभी तक है, जब तक इन पर भगवत कृपा है। भगवान की शक्ति जाते ही सब गिर जाते हैं। 
                                           जनार्दन त्रिपाठी देवरिया। 

गुरुवार, मार्च 25, 2021

यथामाम् प्रपद्यन्ते

 ये यथामाम् प्रपद्यन्ते, तेस्तथैव भजाम्यहम् ।

मैं आलसी को रोग, चिन्तन करने वाले को ज्ञान, ईर्ष्या की दृष्टि से देखने वाले को शत्रु और पुरुषार्थी को पदार्थ के रूप में प्राप्त होता हूँ। 

रविवार, जनवरी 10, 2021

कुचक्र में मानव

आध्यात्मिक क्रियाकलापों द्वारा जीव, जीवात्मा  के साथ रह सकता है। लेकिन वह ऐसे भ्रम जाल फंसा रहता है जहां से निकलने की कोई गुंजाइश नहीं होती। वह प्रतिपल तन के सुख में डूबा रहना चाहता है। जीवात्मा के साथ रहने मे उसे तनिक भी अच्छा नहीं लगता। वह वैभव के ही उपायों में डूबता उतराता रहता है। 
                                  Janardan Tripathi 
                                      9005030949 

शुक्रवार, जनवरी 08, 2021

जीवन सूत्र

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन काल में सुख, समृद्धि, शान्ति और सदाचार प्राप्त कर जीवन की समाप्ति पर मोक्ष प्राप्त  करना चाहता है। लेकिन इच्छा, स्वार्थ और मतिभ्रम की स्थिति में वह इन ध्येयों से दूर हो जाता है। धर्म संकट की स्थिति में-addhyatmajnardantripathi.blogspot.com 
को पढना चाहिए। 

शुक्रवार, सितंबर 18, 2020

जीवन

जब तक सासें चल रही है तभी  तक जीवन है ।  कौन जाने शरीर को त्यागकर अनंत अंतरिक्ष में गुम हुआ हमारा सांस फिर पृथ्वी पर किसी रूप में  लौटे कि न लौटे । प्रकृति प्रदत्त इस अनमोल जीवन का विचार कर उपयोग करना चाहिए । अहं भाव में लीन हम कष्ट झेलते हैं । और अहं से मुक्त होकर अपनें अंदर कल्याणकारी भाव पैदा करते हैं एवं  लोगों के बीच रहते हुए भी हम दिव्य हो जाते हैं । जनार्दन।
                                      

सोमवार, सितंबर 14, 2020

सर्वश्रेष्ठ निर्माता-निर्देशक ईश्वर

निर्देशक क्षमता, योग्यता, कुशलता एवं पात्रता का निरीक्षण कर अभिनय की भूमिका वितरित करता है । अभिनय दल में सबसे अधिक ऊर्जावान और चुनौतियों से निपटने में सक्षम को हीरो एवं अन्य को यथोचित भूमिकाएं देता है 
       ईश्वर रूपी निर्माता-निर्देशक द्वारा भी संसार से संबंधित यही नियम है । जनार्दन।

सोमवार, जुलाई 27, 2020

क्रोध

 आप किसी सभा में  शान्तिपूर्वक  बैठे हों ,और बगल में बैठा ब्यक्ति डिस्टर्व करे तो आप को क्रोध आना स्वाभाविक है । ये क्रोध कहाँ से आया ? 
  हम अनुभव करते हैं  कि काम, क्रोध, लोभ और मोह प्रकृति की शक्ति हैं और जीव के शरीर के बाहर सर्वत्र व्याप्त हैं जीव के दिमाग को कुछ समय तक नियंत्रित करने की इनमें क्षमता है।अवसर उत्पन्न होते ही जीव के दिमाग में प्रकट हो जाते हैं ।और अपना कार्य कर चले जाते हैं एवं  उस समय उनके द्वारा उत्पन्न किए गए प्रभाव को जीव भोगता है ,मनुष्य पर इसका प्रभाव ज्यादा होता है, उसके विकास रुक जाते हैं । अतः इनके प्रभाव में आने से बचना चाहिए ।         Janardan Tripathi 
addhyatmajanardantripathi.blogspot.com 

सोमवार, मार्च 16, 2020

कर्म

हम रोजाना कर्म करते हैं। अध्यात्म के अनुसार,कर्म अच्छा हो या बुरा,सभी बन्धन  के कारण हैं। सब सोचते हैं कि जिन्दगी  मिली है कुछ कर के दिखाऊं। किसको दिखाना है? जन्म देने वाले माता पिता क्या यह जानते थे कि हम किसको जन्म देने जा रहे हैं ? बहुत से लोग जिनसे पूर्व में हमारे सम्बंध थे ,हम एक साथ पढ़े ,खेले कार्य किये, इस पृथ्वी पर ही हैं ,लेकिन हमारे लिए इस जन्म में दुर्लभ हैं। हमनें दिखाने के लिए घर बढ़ाए ,गाड़ियां बढ़ायी, जमीन बढ़ाए इत्यादि।फरेब की दुनियां बढ़ायी। हमनें ऐसे कोई कर्म नहीं किये जो इसमाया के संसार को  रचने वाले मायाधीश को देखने-सुनने योग्य हो। जनार्दन।


                 

सोमवार, फ़रवरी 24, 2020

निश्चिन्तता

यदि हम लगातार परिचित माहौल में रहते हैं,तो इससे निश्चिन्तता तो होगी,पर विकास की कोई गुंजाइश नहीं होगी।यह सर्कस पर कलावाजी  वाले झूले की तरह है। जब तक झूले के साथ झूलते हैं तबतक तो सब ठीक होता है।लेकिन जब रस्सी छोड़ कर दूसरी रस्सी पकड़ने की कोशिश करते हैं तो दोनो रस्सियों के बीच की स्थिति बड़ी भयावह होती है।क्योकि उस समय हम न इधर के होते हैं न उधर के।
    जो लोग भी जीवन के दूसरे आयामों के बारे में पता लगाना और अनुभव करना चाहते हैं उन सबकी यही दसा होती है।वे जीवन के दूसरे पहलू को जानना तो चाहते हैं,लेकिन अपने परिचित आयाम को एक पल भी छोड़ना नहीं चाहते।

सोमवार, दिसंबर 30, 2019

शरीर

शरीर मांस एवं रुधिर का पिण्ड है इसमें कुछ हड्डियां हैं।इसके ऊपर चमड़े का कवर है।इसमें बात,कफ,पित्त सदा बनता बिगड़तआ रहता है।इसके नौ द्वारों से गन्दगी ही निकलती है।
  संसार में ममता रखना दुख का कारण है ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि संसार से आसक्ति मिटे।

          जनार्दन त्रिपाठी।

रविवार, जुलाई 28, 2019

अन्दर की आवाज

अन्दर की आती आवाज को  हम  कई बार भ्रम मान लेते हैं,जबकि यह हमसे बात करती है। भावनाओं के  जरिये हमसे  बात  करना इसका पसंदीदा तरीका है। हमअपने भीतर से उठ रही  आवाज को सुने क्योकि,यह हमें  दुनिया में अपना बेहतर योगदान देने का संकेत दे रही है।

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