मंगलवार, सितंबर 30, 2014

माया-जीव

जैसे स्वप्न मे देखे जाने वाले पदार्थों
से उसे देखने वाले का कोई सम्वंध
नही होता वैसे शरीर से अतीत अनु
भव माया द्वारा नष्ट हो जाते हैं | जिस
समय समस्त इंद्रिया विषयों से हट
कर ईश्वर में स्थित हो जाती हैं उस
समय मनुष्य के रागद्वेषादि सारे
क्लेश  नष्ट हो जाते हैं |

Life cycle

Life cycle involves
Birth. Growth.  Re-
Production and
Death .
and seeks answer to
what is the purpose
of of life ,we shall not
answering.
we observe patients
lying in coma in hospitals
virtually supported by
machines which replace
heart and lungs. the patient
otherwise brain dead . Are
such patients who never
come back to normallife living or
non-living ?    Janardan Tripathi. 

ईश्वर को

दर्शन .धार्मिक ग्रन्थ .धर्मस्थल ईत्यादि
ईश्वरीय सत्ता को बताने का प्रयास है |
तिव्रसाधना और लगन से मूर्ति में चैतन्य
सत्ता का अनुभव किया जा सकता है |
ईश्वर को देखा जा सकता है.उनसे बातें
किया जा सकता है | परन्तु कौन इसकी
परवाह करता है |
  अपनेआप को किसी उच्चतर की सेवा
में लगायें. और जब थोड़ा अवकाश मिले
तो लोगों को इकट्ठाकर  अध्ययन
संगीत. वार्तालाप और अवतारों के चरित्र
की दैवी विशेषताओं पर विचार विमर्श
करें |
हम चाहे जिस कर्म में लगे हों यह समझें
कि ईश्वर ने ही अपनेआप को विभिन्न
जीवो के रूप में अभिव्यक्त किया है |
जीव-सेवा . ईश्वर-सेवा है | सबमें देवत्व
की अनुभूति अहंकार को ठहरने नही
देती | इसका अनुभव कर लेने पर हम
किसी से न तो ईर्ष्या करते है और न
ही हमारे अन्दर किसी पर दया करने
की जरूरत पड़ती | जीव को शिव का
रूप जानकर उसकी सेवा करने से चित्त
शुद्ध होता है | और अविलम्व ऐसा
साधक यह अनुभव करता है कि वह
भी ईश्वर का अविभक्त अंश है |

गुरुवार, सितंबर 04, 2014

वैराग्य

घर बार छोड़कर कहीं जाकर बैठ
जाना वैराग्य नहीं है | घर छोड़ना
कोई बड़ी बात नहीं है | जिसके
मन में आसक्ति है „ वह कही चला
जाय वहा किसी न किसी चीज
से राग बना ही लेगा | जिसदिन
यह बात समझ में आ गई कि यह
शरीर मिट्टी है ; जिस संसार को
हम देख रहे हैं यह सदा नही रहेगा
और मृत्यु -सत्य एवं अवश्यम्भावी
है संसार किसी की भी जागीर
नही है| तो समझें वैराग्य हो गया |
ब्यक्ति के मन से नेता, कार्यकर्ता या 
उपदेष्टा का भाव गायब हो जाय ।
Janardantripathi 9005030949

शुक्रवार, अगस्त 22, 2014

भक्ति

हम सभी अपने अपनेभाई वहन
माता पिता पुत्र पत्नी इत्यादि तथा
समाज एवं संसार से सुख चाहते
है| और सुख प्राप्ति के विभिन्न
प्रयत्न करते है | ईश्वर की भक्ति
भी सुख प्राप्ति हेतु ही करते है|

   किसी से कुछ प्राप्त करने के
तीन उपाय हैं एक जोरजबरदस्ती
से दूसरा चोरीकर तीसरा मॉगकर|

   सांसारिक लोग सुख हेतुकिसी
न किसी से मॉगते है चोरी करते
हैं या जबरदस्ती पाने का प्रयास
करते हैं |

संसार में सुख नहीं है यहां कोई
सुखी नही है सब एक दूसरे से
मॉगते चोरी करते या जबरदस्ती
करते हैं |परन्तु जो रहेगा वही न
पायेंगे सो दुख व पदार्थ जो संसार
में है वह पाते हैं |

ईश्वर में सुख है | लेकिन वहा न
चोरी किया जा सकता न
जबरदस्ती मॉगने पर केवल इंद्रिय
सुख ही मिलेगा |

सब संसार ईश्वर का है सब जीव
जन्तु पेड़पौधे ईश्वर के हैं शरीर
ईश्वर के पंचभूतों का है अत: छोटे
से भूखण्ड पर कब्जा कर तेरा
तुझको अर्पण कहना मूर्खता है |
ईश्वर को कुछ देकर पाने की
इच्छा धुर्तता है | मंदिर में ही ताले
में बंद कर दिये है सोचना मक्कारी
है |

सुख केवल निश्छल हृदय व पवित्र
मन से ईश्वर भक्ति में भक्त को है |
ईश्वर भक्ति दवा है और समस्त दुख
क्लेश रोग है दवा का सेवन किये
बिना रोग से मुक्ति असम्भव है |
 
                    जनार्दन त्रिपाठी 

गुरुवार, अगस्त 21, 2014

सूक्ष्म

श्रृष्टि संचालन प्रक्रिया पर ध्यान दें
तो प्रतीत होगा कि सुक्ष्म श क्तियों
के सहारे ही पृथ्वी सूर्य का चक्कर
लगाती है | तात्पर्य है कि सूक्ष्मशक्ति
स्थूल से ताकतवर होती है |
  जल स्थूल है लेकिन सूक्ष्म वाष्प
मे परिवर्तित होने पर उसकी ताकत
बढ़ जाती है | इसीप्रकार हर स्थूल
वस्तु सूक्ष्म मे परिवर्तित होने पर
ताकतवर हो जायेगी |

गुरुवार, मई 29, 2014

रविवार, मई 04, 2014

शरीर/humen body/

शरीर का तभी तक महत्व है जब तक उसमे
जीव वसता हो | शरीर में बैठे जीव के दर्शन
के आकांक्षी को ;शरीर  को मंदिर की तरह
पवित्र रखने का अभ्यास करना चाहिये|
   जिसकी आंखें शरीर में रहते हुवे जीव को
देख सकती है' वही देव को देख सकता है
वही परोपकार कर सकता है तथा दूसरों को
सुख सन्तोष देते हुवे स्वयं सुख की अनुभूति
कर सकता है|
      जनार्दन त्रिपाठी मो 9005030949

बुधवार, मार्च 12, 2014

ईश्वर का निराकार रूप

यह हमारे अंतःकरण में दिब्य भावनाओं एवं
मस्तिष्क में दिब्य विचार के रूप में रहती है |
मनुष्य में ईश्वरीय सत्ता -भावना . ज्ञान सत्ता
एवं हलचल के रूप मे दृष्टिगोचर होती है |

बुधवार, जनवरी 01, 2014

आध्यात्म

पृथ्वी पर कुछ भी स्थाई नही है | यह जड़ चेतन
संसार एक दूसरे के सहयोग से संचालित है|
सेवा भाव से जो ब्यक्ति मानवता के विकास हेतु
काम करता है ,वह अपने नाम ,रूप एव कीर्ति
को पृथ्वी पर अमर कर देता है| ं
यह शरीर हड्डी मांस व रूधिर का पिण्ड है| इसमे
5 ग्यानिेन्द्र्यां एवं 5 कर्मेन्द्रियां हैं | भोग इन्द्रियों
के विषय हैं , भोगों में प्रवृति क्रृत्रिम व निवृति
स्वाभाविक होती है| (कामना तो कृत्रिम रूप से
होती है परन्तु कामना से निवृति स्वाभाविक हो
जाती है ) |
अहंकारी,मिथ्याचारी,ईर्षालु,रिश्वतखोर,तथा दहेज
लोभी एवं अकूत धन संगरह करने वाला मृत्योप
रांत अपने सूछ्म शरीर से स्वप्न देखते हुए मनुष्य
के समान हजारों वर्ष तक यातनाएं झेलता है|
जनार्दन त्रिपाठी
मो़ न. 9005030949

मंगलवार, नवंबर 20, 2012

दुष्टता का प्रतिरोध ईश्वरीय सेवा का कार्य

  दुष्टता का प्रतिरोध ईश्वरीय सेवा का कार्य है।प्रभु स्वयं यह कार्य करते हैं और इस कार्य में लगे लोगों का सहयोग करते है।

 

धर्म का सही अर्थ है विनम्र व्यवहार






धर्म का सही अर्थ है विनम्र व्यवहार :-  परमात्मा जिस पर प्रशन्न होता है उसे विनम्र और जिसपर नाराज होता है उसे क्रोधी बनाता है। यदि आपको लगता है कि आपका स्वभाव क्रोधी है।तो आप प्रभु से अपने लिए केवल विनम्रता ही मागिये।व्यक्तित्व के गुण जैसे :-पहनावा ,रहन -सहन ,वार्तालाप का तरीका और विनम्रता इत्यादि मनुष्य की सफलता पर बहुत अधिक प्रभाव डालते है।  क्या नाम जपने ,तीर्थ -स्नान करने ,मन्दिर, मस्जिद,गिरिजाघर या गुरुद्वारा  जाने ,दान देने ,कर्मकांड का टंट -घंट करने और अनाचार से रहते हुए प्रतिदिन पूजापाठ करने से धर्मोद्देश्य की पूर्ति हो जाएगी? धर्म का सही अर्थ है विनम्र व्यवहार। और भूखे पेट के लिए उसका सारा धर्म है भोजन जुटाना।   जनार्दन त्रिपाठी मोन 9005030949.

शनिवार, नवंबर 19, 2011

ALL ARE FRIENDS

in prosperity all are friends, no anyone is friend in bad times. life is like a shadow which repeats itself,all is false-this brittle life,these web-like relations,why we then ? keep carrying this load of sin.nothing is mine or your in this world, have throughts like a holy saint.be it a king or begger, all have to die the same way .we visit holy places but do not try to peep inside our soul . we feel proud about our look and outfit but do not keep our thoughts pure.        janardan tripathi india                  mo. no.9005030949. 

सोमवार, सितंबर 12, 2011

समय / काल

हम जन्म से पहले अप्रकट थे ,और मरने के बाद भी अप्रकट हो जायेगे ,  बलवान काल /समय की प्रेरणा से हम भिन्न -भिन्न अवस्थाओं में भ्रमण करते हैं किन्तु समय /काल के प्रबल पराक्रम को नहीं जानते तथा सुख की अ भिलासा से जिन -जिन वस्तुओं को बड़े कष्ट से प्राप्त करते हैं,काल उन्हें विनस्ट कर देता  है , यह देख हमे बड़ा शोक होता है क्योकि हम अपने नाशवान शरीर तथा उसके सम्बंधियो के धन और घर आदि को मोह बस नित्य / सत्य मान लेते हैं /

जनार्दन त्रिपाठी मो नं 9005030949.

रविवार, अगस्त 28, 2011

वेद ( श्रुति )WED {SHRUTI}

वेद;-प्रारम्भ में वेदों का ज्ञान गुरु -शिष्य परम्परा से पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहा ,बाद  में महर्षि पराशर  के तेजशवी पुत्र कृष्ण द्वैपायन व्यास ने वेदों के इस विशाल ज्ञान को लिपिबद्ध किया /यह समस्त ज्ञान चार वेदों में संकलित है /       १;-रिगुवेद - इसमें सर्वाधिक प्राचीन ज्ञान संगृहीत है ,तथा  पदार्थों के गुण  एवं उन  गुणों के नियंता  का वर्णन है/ इसमें १० मंडल हैं और दसों मंडल में १०५२१ मंत्र हैं/ ये सारे मंत्र १०२८ सूत्रों में विभाजित हैं /       २;-यजुर्वेद -इसमें यज्ञ कर्म के मंत्रो का संग्रह है, एवं इसमें४० अद्ध्यायो में कुल १९७५ मंत्र  हैं/                              ३;-सामवेद -इसमें ६ अद्ध्यायों में १८७३ मंत्र हैं तथा इसमें ऐसी मान्यता है कि गाकर मंत्र बोलने से जीव का परमात्मा से समन्वय होता है/         ४;-अथर्ववेद -अथर्ववेद को पवित्र वेद का स्थान नहीं प्राप्त है;इसमें मारण,मोहन ,उच्चाटन ,तथा जादू ,टोने आदि के मंत्र मिलते हैं/प्रारंभ में पवित्र ब्राह्मन -पुरोहितों का वर्ग इसे वेदों की श्रेणी में लेने को तैयार नहीं था /परन्तु आगे चलकर तीनो वेदों के साथ रखा जाने लगा / इसमें २० कांड हैं ,जिन्हें ७3१ सूक्तों में बाटा गया है ,तथा इसमें कुल ५९७७ मंत्रो का  उल्लेख है/                                                                 जनार्दन त्रिपाठी  मो,न, 09005030949
                                                                              
अथर्ववेद में चिकित्सा पद्धतियो ,पति-पत्नी के कर्तव्यों, विवाह के नियमों, मानमर्यादाओ का भी उत्तम विवेचन है । इसमें ब्रह्म की उपासना सम्बन्धी बहुत से मंत्र भी हैं ।
वेदांग-समय बीतने के साथ वैदिक साहित्य जटिल एवं कठिन प्रतीत होने लगा उस समय वेदों के अर्थ तथा विषयो के स्पष्टीकरण के लिए अनेक सूत्र ग्रंथ लिखे जाने लगे इन्हें वेेदांग  कहा गया ।
वेदांग 6हैं । शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, कल्प और ज्योतिष । पहले 4वेदांग  मंत्र के शुद्ध उच्चारण और  अर्थ समझने के लिए तथा अंतिम दो वेदांग  धार्मिक कर्मकांड और यज्ञों का समय जानने के लिए आवश्यक है ।

वैदिक काल, वैदिक साहित्य, वैदिक धर्म, वैदिक संस्कृति इत्यादि में समय-समय पर वेदों की समीक्षा की गई है ।    Janardan Tripathi. 

शनिवार, अगस्त 06, 2011

खुश रहने के सिद्धांत

खुश रहने के सिद्धांत ;-  जो अच्छा वार्तालाप करे उसी से बोलें  / ;---खुश रहें और खुश लोगों से सम्बन्ध   रखें  /  ;--- जिन कर्मो का जीवन में कोई उपयोग न हो उसे कभी न अपनाएं  /  ;---सफल लोगों से अपने आप को जोड़ें  / एवं उनके कार्यों में सहयोग करें  / ;---वर्तमान तन्त्र को तभी तक जीवित रखें जब तक लोगों का सहयोग प्राप्त है सहयोगियों क़ी संख्या कम होने पर तन्त्र को बंद कर दें  / ;---ध्यान रखें ;--जब सारे सात्विक लोग आलसी हो जाते हैं ,तो धन दौलत पर राक्छ्सी प्रवृति के लोगों का कब्जा हो जाता है /अतिथि सत्कार ;---आने पर स्वागत , -----एकांत में कुछ समय , -----और जाते वक्त कुछ कदम साथ चलें  / भुत एवं भविष्य का विचार करके जो भी कार्य  करेंगे ,आप सदैव उस कर्म से सुखी रहेंगे / ;----मक्खी -मच्छर आदि छुद्र जीवों को दूर करके भी आत्मिक -शांति प्राप्त करें / महगाई से बचाव का तरीका ;------सामान क़ी उपयोगिता  हो तो सामान खरीदें /                        बजट  के अनुसार प्लानिंग करें /                                सीजनल सब्जियां खरीदे ,पोषक भी होती हैं और सस्ती भी /             घर के नजदीक जाना हो तो पैदल  चलें /

शुक्रवार, अगस्त 05, 2011

चैतन्य आत्मा

चैतन्य आत्मा ;-मानव शरीर माता  के गर्भ में स्वतंत्र रूप से विकसित नहीं होता ,उसके विकास का कारणशरीर के भीतर रहने वाला जीव है / जीव केबिना प्राकृत शरीर न आकार ग्रहण कर सकता  है और न ही विकसित हो  सकता है /जब किसी प्राकृत पदार्थ  में विकास लक्छित होता है ,तब यह समझा जाना चाहिए की उसमे चैतन्य आत्मा विद्यमान है / विराटविश्व उसी तरह विकसित हुआ है जिस तरह एक शिशु का शरीर विकसित होता है /इसलिए "दिब्य तत्व तर्कसंगत है " किन्तु यह वाणी एवं मन की अवधारणा से परे है / काळ इश्वर की शक्ति है /जो सब प्रकार से भौतिक गति का नियंत्रण करती है / लोग त्रिलोक में समय -समय पर होने वाले प्रलयों एवं जन्म-मृत्यु को भूल जाते हैं ,यही  माया है /
जनार्दन त्रिपाठी मो नं 9005030949.

मंगलवार, मई 24, 2011

शक्ति/power.

शक्ति सार्वभौमिक एवं सर्व ब्याप्त है/सार्वभौमिक शक्ति वह छमता है-जिससे हम दुसरे के ब्यावहारों को नियंत्रित करते हैं/परिवार पर मुखिया ,बस में कंडक्टर इत्यादि अपने शक्ति का प्रयोग करते हैं/सैन्य एवं आर्थिक दृष्टि से शक्तिशाली राष्ट्र अन्य राष्ट्रों पर अपना प्रभाव रखते हैं/  हर समाज में कुछ इने-गिने लोगों के पास अपने समाज की शक्ति निहित होती है, धार्मिक नेता के पास भी अपने अनुयाइयों पर अपने प्रभाव की शक्ति होती है/ राज्यों की सेना धन द्वारा संचालित होती है/इस प्रकार यदि देखा जय तो -सैन्यशक्ति,आर्थिक-शक्ति,धार्मिक-शक्ति,मनोवैज्ञानिक-शक्ति,राजनितिक-शक्ति और मिडिया-शक्ति,वर्तमान समय की शक्ति है/

रविवार, जनवरी 30, 2011

सब में ईश्वर

जो ब्यक्ति सबमे इश्वर और इश्वर में सबको देखता है,उसके लिए इश्वर अदृश्य नहीं होते ,और न ही वह इश्वर के लिए अदृश्य होता है/  मनुष्य का मन उसका प्रभु की तरफ से ध्यान हटाता है/ मन जो भी खराब कार्य करता है,मनुष्य क़ो उश्का दंड भुगतना पड़ता है/ किसी क़ो नफरत की दृष्टि से देखने पर इश्वर शत्रु के रूप में, पुरुषार्थ करने पर पदार्थ के रूप में, चिन्तन करने पर ज्ञान के रूप में, एवं अलश्य करने पर रोग के रूप में इश्वर इसी संसार में प्राप्त होते हैं/ जिज्ञासु की जिज्ञासा होती है,की ब्रह्माण्ड की रचना करने वाले ने इसकी रचना क्यों की? जिस तरह गाना या गुनगुनाना एक स्वाभाविक क्रिया है वहां जरूरत शब्द की जरूरत नहीं,है उसी तरह दुनिया बनाने वाले क़ो भी/ मन में प्रश्न उठता है की जिस इश्वर ने इस प्रकार की रचना की उस  इश्वर क़ो किसने बनाया? उत्तर है की क्या इश्वर मरेगा ,यदि ओह मरता नहीं तो पैदा कैसे हो सकता / पैदा होना और मरना जीव से सम्बन्धित है,इश्वर से नहीं/
  जनार्दन त्रिपाठी

शनिवार, जनवरी 29, 2011

ईश्वर का रहस्य

जिस प्रकार मनुष्य युक्ति के द्वारा ,आग,दूध ,पृथ्वी से अन्न, जल और ब्यापार से अपनी आजीविका प्राप्त कर लेता है,वैसे ही विवेकी पुरुष अपनी बुद्धि - ज्ञान द्वारा इश्वर क़ो प्राप्त कर लेते हैं/ इश्वर का स्वरुप ज्ञान रूप है/ उसमे माया द्वारा रचित विशेषताएं नही हैं/ और किसी भी वैदिक या लौकिक शब्द की वहां तक पहुंच नहीं है/इश्वर के स्वरुप के छोटे से भाग में पशुपक्छी और मनुश्यादी  की श्रृष्टि विद्यमान है/ मन क़ो पूर्णतया एकाग्र करके इश्वर और उसके आश्रय से रहने वाली माया क़ो समझा जा सकता है/ जैसे ब्रिक्छ की जड़ क़ो पानी से सीचना ,उसकी शाखाओं ,डालिओं, पत्तों, फलों ,फूलों क़ो भी सीचना है,वैसे ही  इश्वर क़ो समझना सम्पूर्ण प्राणियों सहित अपने आप क़ो भी समझना है/ इश्वर का रह्श्य तर्क वितर्क -कुतर्क से परे है ।

जनार्दन त्रिपाठी मो नं 9005030949

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