सोमवार, मार्च 16, 2020

कर्म

हम रोजाना कर्म करते हैं। अध्यात्म के अनुसार,कर्म अच्छा हो या बुरा,सभी बन्धन  के कारण हैं। सब सोचते हैं कि जिन्दगी  मिली है कुछ कर के दिखाऊं। किसको दिखाना है? जन्म देने वाले माता पिता क्या यह जानते थे कि हम किसको जन्म देने जा रहे हैं ? बहुत से लोग जिनसे पूर्व में हमारे सम्बंध थे ,हम एक साथ पढ़े ,खेले कार्य किये, इस पृथ्वी पर ही हैं ,लेकिन हमारे लिए इस जन्म में दुर्लभ हैं। हमनें दिखाने के लिए घर बढ़ाए ,गाड़ियां बढ़ायी, जमीन बढ़ाए इत्यादि।फरेब की दुनियां बढ़ायी। हमनें ऐसे कोई कर्म नहीं किये जो इसमाया के संसार को  रचने वाले मायाधीश को देखने-सुनने योग्य हो। जनार्दन।


                 

सोमवार, फ़रवरी 24, 2020

निश्चिन्तता

यदि हम लगातार परिचित माहौल में रहते हैं,तो इससे निश्चिन्तता तो होगी,पर विकास की कोई गुंजाइश नहीं होगी।यह सर्कस पर कलावाजी  वाले झूले की तरह है। जब तक झूले के साथ झूलते हैं तबतक तो सब ठीक होता है।लेकिन जब रस्सी छोड़ कर दूसरी रस्सी पकड़ने की कोशिश करते हैं तो दोनो रस्सियों के बीच की स्थिति बड़ी भयावह होती है।क्योकि उस समय हम न इधर के होते हैं न उधर के।
    जो लोग भी जीवन के दूसरे आयामों के बारे में पता लगाना और अनुभव करना चाहते हैं उन सबकी यही दसा होती है।वे जीवन के दूसरे पहलू को जानना तो चाहते हैं,लेकिन अपने परिचित आयाम को एक पल भी छोड़ना नहीं चाहते।

सोमवार, दिसंबर 30, 2019

शरीर

शरीर मांस एवं रुधिर का पिण्ड है इसमें कुछ हड्डियां हैं।इसके ऊपर चमड़े का कवर है।इसमें बात,कफ,पित्त सदा बनता बिगड़तआ रहता है।इसके नौ द्वारों से गन्दगी ही निकलती है।
  संसार में ममता रखना दुख का कारण है ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि संसार से आसक्ति मिटे।

          जनार्दन त्रिपाठी।

रविवार, जुलाई 28, 2019

अन्दर की आवाज

अन्दर की आती आवाज को  हम  कई बार भ्रम मान लेते हैं,जबकि यह हमसे बात करती है। भावनाओं के  जरिये हमसे  बात  करना इसका पसंदीदा तरीका है। हमअपने भीतर से उठ रही  आवाज को सुने क्योकि,यह हमें  दुनिया में अपना बेहतर योगदान देने का संकेत दे रही है।

सोमवार, दिसंबर 03, 2018

दर्पहारी

परमपिता परमेश्वर किसी के द्वारा शक्ति या प्रभुत्व का अपव्यवहार सहन नहीं करते। वे किसी का भी दर्प वर्दास्त नहीं करते। इसलिए व्यवहार जगत में हम देखते हैं कि,जो व्यक्ति क्षमता का अपव्यवहार करता है वह एक दिन ऐसा गिर जाता है कि उसकी अस्थि, चर्म सब कुछ पहचान के अयोग्य हो जाता है।
        सत्ता के बिना कोई अस्तित्व सिद्ध नहीं होता है। कार्य हो रहा है और एक सत्ता उसे देख रही है। वस्तु साक्षी सत्ता है। किन्तु द्रस्टा सिद्ध सत्ता है।
   

         जनार्दन त्रिपाठी।

मंगलवार, नवंबर 13, 2018

सामान्य एवं दार्शनिक बुद्धि मनुष्य

सामान्य मनुष्य एक ऐसी ब्यक्त सत्ता चाहता है, जो उसका सुख दुख समझे।और हर एक विकट परिस्थिति में वेदना सुनें।और उसके जैसा हो।सामान्य मनुष्य अव्यक्त सत्ता के प्रति आकर्षित नहीं होता। भारत में दार्शनिक बुद्धि वाले लोग अब्यक्त सत्ता मानते हैं। ज्ञानी अनुमान लगा लेते हैं कि अब्यक्त सत्ता है। और अब्यक्त सत्ता होनें के कारण उनके केन्द्र को पाना बहुत कठिन है।
     मनुष्य पृथ्वी पर अधिकतम 125 वर्षों के लिए आता है, इस अल्प समय में वह अव्यक्त सत्ता को नहीं समझ सकता।अतः मृत्यु अतिसंनिकट समझ कर कार्य करना उचित है। पशु पक्षी,  पेड़ पौधे एवं अन्य जीव जंतु अपने सहज वृत्ति से प्रेरित होकर कर्म करते हैं।
          जनार्दन त्रिपाठी

सोमवार, जुलाई 09, 2018

God & Nature

एक से अनेक होने की इच्छा से परमपिता परमेश्वर ने सृष्टि की रचना की। समय और प्रकृति सब जीवो को भ्रमित कर रखते हैं। प्रकृति से उत्पत्ति, पालन पोषण तथा संहार करवाकर  समय (काल) अपना आहार तैयार करवाता है। परमेश्वर आग तत्व से भी जटिल हैं। अग्नि तत्व को किसी रूप विशेष में ही रख़ कर ले जाया जा सकता है। 
                     परमेश्वर को समझना  अग्नि को समझने जैसा ही है।   
                     जनार्दन त्रिपाठी

गुरुवार, जनवरी 11, 2018

बाहरी संसार की खुशी

हम एक के बाद एक इच्छा पूर्ति मे‌‍ लगे रहते हैं। बाद में ज्ञात होता है कि बाहरी संसार की खुशी मात्र भ्रम है। जैसे ही एक इच्छा पूरी होती है दूसरी इच्छा उसकी जगह ले लेती है। हमारा जीवन ऐसै ही चलता रहता है। हमारी इंसानी व्यवस्था इस प्रकार रची गयी है कि हम इच्छापूर्ति की ओर ही ध्यान लगाए रहते हैं। लेकिन जीवन के किसी न किसी मोड़ पर हमें एहसास होता है कि बाहरी संसार की खुशी एक क्षणिक भ्रम है। अंत में हमें महसूस होता है कि किसी भी चीज ने हमें वो स्थाई खुशी और संतुष्टि नहीं दी जो हम चाहते थे।
   Janardan Tripathi. 

सोमवार, सितंबर 11, 2017

आत्मविश्वास

संसार का इतिहास बस ऐसे थोड़े से लोगों का इतिहास है, जिन्हें अपने आप में विश्वास था। यदि हम ईश्वर में विश्वास करते हैं और अपने आप में नहीं तो समझें कि नास्तिक हैं। जब कोई अपने आप में विश्वास खोता है तभी से उसके कष्ट शुरू हो जाते हैं। समस्त धर्मों के उद्देश्य दुखों से मुक्ति है। जीवन अल्प है, संसार के आडम्बर क्षणभंगुर हैं। धर्मों के मसीहा भी हमारे समान ही मनुष्य थे, एक मनुष्य का उस स्थिति में पहूचना ही इस बात का प्रमाण है ,कि उसकी प्राप्ति प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव है बस अपने आप में विश्वास होना चाहिए।

     जनार्दन त्रिपाठी 9005030949

शनिवार, अगस्त 19, 2017

माया में पैर फंसाने के लिए नहीं सोचना चाहिए।

पृथ्वी पर प्रभु ने जो काम सौंप कर भेजा है, सब नहीं चाहते हुए भी वही कर रहे हैं । कोई कबाड़ उठा रहा है, कोई नाली , सड़क  इत्यादि निर्माण कर रहा है, कोई धर्म कर्म, पूजा पाठ, कोई कुछ, कोई कुछ कोई कुछ भी नहीं ।
           जनार्दन त्रिपाठी मो नं 9005030949

बुधवार, अगस्त 09, 2017

यज्ञ

मनुष्य सभी प्राणियों मे श्रेष्ठ है। पृथ्वी को ठीक रखना मनुष्य की जिम्मेदारी है। अपने आसपास ठीक रखना हम सब की जिम्मेदारी है। पृथ्वी को जो देंगे वह अन्न,फल, सब्जी , इत्यादि के रुप में, और अन्तरिक्ष को
जोदेंगे वही वायु एवं जल के रूप में वापस मिलेगा। वायु सोधन के उद्देश्य से अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मुल्यवान सुगंधित  पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि में आहुति देना यज्ञ है। यज्ञाग्नि जब तक जीवित रहती है उष्णता एवं प्रकाश की अपनी विशेषता नही छोड़ती , उसी प्रकार हमे भी गतिशील धर्मपरायण , पुरुषार्थी एवं कर्तव्य निष्ठ बने रहना चाहिए। यज्ञाग्नि का वशेष भस्म मस्तक पर लगाते हुए विचार करना चाहिए कि मानव जीवन का अन्त भस्म के रुप मे शेष रह जाएगा।
ज्ञ का मुख्य उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को सत्प्रयोजन के लिए संगठित करना है। स्नान , दान,होम तथा जप यज्ञ के अंग हैं।
गृहस्थ धर्म के यज्ञ --
गृहस्थ को यह प्रतिदिन करना चाहिए।

१-ब्रह्म यज्ञ-    मृतात्मा के स्नेह उपकारों  का स्मरण ।
२-देव यज्ञ-  दुष्प्रवृत्तियों का त्याग, देवप्रवृत्तियों का पोषण।
३- पितृ यज्ञ - काया की समाप्ति के बाद भी जीवन यात्रा रुकती नहीं है। माता पिता के  प्रति श्रद्धा।
४- भूत यज्ञ - गाय, कुत्ता,कौआ, चींटी, एवं देवत्व शक्तियों के निमित्त।
५- मनुष्य यज्ञ- अतिथि सत्कार एवं दान।
जनार्दन त्रिपाठी मो नं 9005030949

शुक्रवार, जनवरी 15, 2016

प्रकृति

प्रकृति का यह विश्वरूप परिमाण अत्यन्त
अद्भुत है कोई भी इसकी यथार्थ गणना
नही कर सकता और अपने चर्मचक्षुओं
से ग्रहनक्षत्रों के गमनागमन को नहीं देख
सकता | प्रत्येक मनुष्य प्रतिक्षण कर्म
करता है और कर्म करते करते स्वर्ग के
सुख तक पहूंच कर पुनः वापस आ जाता
है |

सुख

तृप्ति, सन्तुष्टि और आनन्द स्वयं से प्राप्त होते
हैं और भौतिक सुख समाज से प्राप्त होते हैं
एक भौतिक सुख हेतु तीन सुखों की तिलांजली
ठीक नहीं है | तीनों सुखों के प्राप्त होते ही
भौतिक सुख अनायास  प्राप्त हो जाता है |

अमरत्व

पृथ्वी पर कुछ भी स्थाई नही़ है| यह जड़ चेतन
संसार एक दूसरे के सहयोग से संचालित है |
सेवा एवं सहानुभूति की भावना से कर्म करता
हुआ जो मनुष्य मानवता के विकास हेतु सोचता
एवं कर्म करता है वह अपने नाम, रूप एवं कीर्ति
को पृथ्वी पर अमर कर देता है |

मंगलवार, अक्टूबर 13, 2015

जीवनी शक्ति (प्राण क्रिया)

शरीर यन्त्रवत है . इसके संचालन हेतु वायु
जल और भोजन की आवश्यकता होती है |
शरीर असंख्य कोशों से बना है |
हम जो भी क्रिया कलाप करते हैं .
उससे कोष नष्ट होते रहते हैं जिसके कारण
अंगप्रत्यंग में थकान आता है | यदि नये कोष
का निर्माण न हो और नष्ट हुए कोष उत्सर्जित
न हों  तो हम शिघ्र मृत्यु के ग्रास हो जाएंगे |
दिनभर में जितना हम ठोस आहार लेते है
उससे तीनगुना जल और जल से तीनगुना
आक्सीजन लेते हैं | आक्सीजन कोशों के
निर्माण में मुख्य भूमिका निभाता है |

सामान्यत: हम जो  वायु ग्रहण करते हैं  उसमें
79%नाईट्रोजन 20.96% आक्सीजन और.4%
कार्बनडाईआक्साइड होती है | स्वास द्वारा
आया हुआ नाईट्रोजन नि:स्वास द्वारा तुरन्त
बाहर निकल जाता है | साधारण स्थिति में लिए
गये स्वास से आक्सीजन का कुल 4.5% भाग
ही शरीर ले पाता है |  लम्बी और गहरी स्वास
से 13.5% तक आक्सीजन शरीर ग्रहण कर
लेता है जिससे नये कोष का निर्माण और नष्ट
हुए कोष का उत्सर्जन जल्दी जल्दी होता है  |

पृथ्वी पर देखा गया है कि न्यूगिनी के लोग
हृष्टपुष्ट और दिर्घायु होते हैं | उनका आहार
बहुत ही सामान्य कोटि का है फिर भी वे
उत्साह  और कार्य कुशल हैं |  यह इसलिए
कि लम्बी सॉस का एक व्यायाम  वे
नियमित करते हैं |
    आप निश्चित मानें कि जन्म से पूर्व निर्धारित
है कि आप इस जीवन में कितनी सॉसें लेंगे |
स्वॉस से स्वॉस के वीच समय बढाकर आप
दिर्घायु हो सकते हैं |

सोमवार, अक्टूबर 12, 2015

सिद्धि

मन की अपार सामर्थ्य को एक निश्चित मार्ग
में लगा देने से शक्ति के द्वार खुल जाते हैं |
यही सिद्धि है | ध्यान पूर्वक विचार करने से
ही हम किसी वस्तु के मूल स्वरूप और उसकी
वास्तविकता को जान सकते हैं |  ध्यानयोग
का साधक सिद्धि के मार्ग की ओर पग बढ़ाता
है . उसे हरक्षेत्र मे सफलता ही दिखाई देती है |
    इस विधि से व्यक्ति शक्ति का विकास
करता है | आर्थिकरूप से प्रगति करता है | और
अपनी भौतिक इक्छाओं को मूर्त रूप देता है |
ध्यान के विना ध्येय की सिद्धि संभव नही है |

जनार्दन त्रिपाठी
0 9005030949

शुक्रवार, अक्टूबर 09, 2015

सूक्ष्म

ब्रह्मांड में हर वस्तु गतिशील है | जिस पृथ्वी
पर हम हैं उसकी अनेकों ज्ञात व अज्ञात गतियॉ
हैं | पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है . मंडराती
है तथा सूर्य के साथ कृतिका मंडल की परिक्रमा
करती है | अपनी धुरी पर पृथ्वी 24घंटे24सेके.
में घूम जाती है. सूर्य की परिक्रमा 366 दिन में
करती है और इसके मंडराने की गति प्रत्येक
26026वर्ष में पूर्ण होती है |
  पृथ्वी पर उत्पन्न सभी प्राणी तथा पदार्थों में
गति है | मिट्टी और पत्थर में भी अव्यक्त गति
होती है | पदार्थों को मैंने सृजन क्रिया में व्यस्त
देखा है | विद्युत पुंज में गतिशीलता और इक्छा
शक्ति की  विद्यमानता मैंने अनुभव किया है |
  मैनें देखा है कि . ब्रह्मॉड का हर परमाणु तीब्र
गति से अपना कार्य कर रहा है | सारा ब्रह्मॉड
गतिमय होने के कारण ही शक्तिमय है |

  अपने शरीर में भी हृदय की गति बराबर चलते
रहना जीवन कहलाती है और हृदय की गति
रूकना ही मृत्यु | शरीर एक रासायनिक कारखा
ना है उसके सभी अंग गतिशील रहते है | शरीर
को गतिशील रखने से वह स्वस्थ एवं शक्तिसंपन्न
रहता है |

सूक्ष्म शक्तियों के  विकास का
आधार भी यही है हमने अनुभव किया है |
तप. यौगिक क्रियाएं. चिंतन आदि के द्वारा
सूक्ष्म शरीर के शक्ति केन्द्रो को गतिशील
किया जाता है | और सूक्षमशक्ति .स्थूलशक्ति
से ज्याता प्रभावशाली हो जाती है | जैसे पानी
से ज्यादा ताकतवर उसका वाष्प हो जाता है |

तप

कष्ट सहना . परिश्रम एवं प्रयत्न करना तप है |
जिसतरह आजकल समाज में धनवान बनने
की होड़ है . उसी तरह प्राचीनकाल मे तपस्वी
बनने की होड़ थी | हर व्यक्ति तप की पूजी
एकत्र करने में लगा रहता था | सम्मान का माप
दण्ड तप ही था | तप कई प्रकार के थे-

  कुस्ती . ब्यायाम . आसन और दौड़कर शरीर
स्वस्थ रखना . गहन अध्ययन से विद्वान बनना
लिखने व बोलने का अभ्यासकर लेखक व
वक्ता बनना तप है | अनुकूल विचारवालों का
संगठन बनाकर उसका नेता बनना तप है |

जीवन में जैसा बनने की इक्छा हो . समय
गंवाये विना वैसे ही तप का चुनाव कर लेना
चाहिए | अन्यथा प्रकृतिप्रदत्त  शक्तियॉ
सुस्त पड़ी रहते हुए निष्कृय हो जाती हैं |

जहॉ तप है वहीं शक्ति. सुख शान्ति . आनन्द
धन. कीर्ति. और सबकुछ है |  जो इस विवेक
पूर्ण निर्णय की उपेक्षा करता है . वह आज
नहीं तो कल  दीनहीन. दुखी और विपत्तिग्रस्त
बनकर रहेगा |

गुरुवार, अगस्त 27, 2015

जीव एवं इंद्रिय

जीव हमेंशा प्रेम एवं आनन्द में रहना चाहता
है और उसकी इन्द्रियॉ भोगों में आनन्द अनुभव
कराती हैं | इंन्द्रियों का सम्वन्ध बाहरी संसार
से होता है अत: जब तक जीव इंन्द्रियों के
भोग पर आश्रित रहता है तबतक वह सुखदुख
के जंजाल में पड़ा रहता है | इन्द्रियो
में शक्ति कम होती है |
    प्रवृति जीव करता है इंन्द्रियॉ प्रवृति का
पालन कराने में जुट जाती हैं चूंकि इंन्द्रियों
में शक्ति कम होती है इसलिए इंद्रिय शक्ति

समाप्त होते ही  निवृति भी

स्वत: हो जाती है | और सुखदुख का उतार
चढ़ाव निरंतर चलता रहता है | जानकार लोग
अपने जीवन को ऐसे व्यवस्थित करते हैं कि
वे अपने आप तृप्त एवं संतुष्ट रहते हैं |
हम अभ्यास से अपने को शान्त कर सुख
और संतुष्ट जीवन बिता सकते हैं |

हम पृथ्वी पर कई हजार वर्ष तक जीवित
रहने नही आए हैं | समाज एवं सरकारों ने
कुछ नियम बना दिए हैं वे नियम भौतिक
क्रियाओं की पूर्ति हेतु हैं एवं माया के संसार
की रचना किए हुए हैं | 

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